दिग्विजय में दो दिवसीय संगोष्ठी सम्पन्न पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचारों पर हुआ मंथन

राजनांदगांव – शासकीय दिग्विजय महाविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग द्वारा पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचारों पर आधारित दो दिवसीय शोध संगोष्ठी 20, 21 दिसम्बर 2017 को गरिमामय आयोजन के साथ सम्पन्न हुई।
डाॅ. केवलचंद जैन (पूर्व अध्यक्ष) सागर विश्वविद्यालय की अध्यक्षता में अंतिम दिन डाॅ. पूर्णेन्दु सक्सेना (वरिष्ठ चिकित्सक) रायपुर एवं केन्द्रीय वि.वि. बिलासपुर के डीन डाॅ. पी.के. वाजपेयी सहित नागपुर से पधारे विचारक श्री दयाशंकर तिवारी विशेष अतिथि/वक्ता के रूप में उपस्थित थे। इस सत्र में विचारक दयाशंकर तिवारी ने उपाध्याय जी के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर प्रभावी विचार व्यक्त किये। उन्होंने भारतीयता की नींव के रूप में संस्कृति को महत्वपूर्ण बताया। पुरूषोत्तम दास टंडन के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि किस प्रकार उन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा न मिलने के कारण कांग्रेस से इस्तीफा दिया था।
डाॅ. पूर्णेन्दु सक्सेना ने अपने वक्तव्य में कहा कि एकात्मवाद वस्तुतः उपाध्याय जी का ’वाद’ नहीं मौलिक दर्शन है। भारत की विविधता में एकता की जो संस्कृति है, उसे पं. दीनदयाल उपाध्याय ने समन्वित किया है। मानव शरीर एकात्म का प्रतीक है। जैसे सम्पूर्ण अंग मिलकर शरीर का रूप धारण किये है, उसी प्रकार भारतीयता इसकी सांस्कृतिक विविधताओं से बनी है।
डाॅ. पी.के. वाजपेयी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन-दर्शन का विस्तार से उल्लेख किया और बताया कि आपका विचार सनातन परंपरा के साथ चलते हुए आज भी युगानुकूल है।
उल्लेखनीय है कि इस संगोष्ठी में कुल चार विश्वविद्यालयों के कुलपतियों सहित सामाजिक कार्यकत्र्ता, विचारक, प्राध्यापक एवं शोधार्थी न केवल सहभागी बने बल्कि अपने विचारों का आदान-प्रदान की किये। प्राचार्य डाॅ. आर.एन. सिंह एवं विभागाध्यक्ष डाॅ. चंद्रिका नाथवानी के मार्गदर्शन संयोजन में विभागीय प्राध्यापक डाॅ. डी.पी.कुर्रे, डाॅ. श्रीमती सुमीता श्रीवास्तव, डाॅ. महेश श्रीवास्तव, डाॅ. मीना प्रसाद ने अपने व्यक्तिगत चिंतन के आयोजन को उत्कृष्ट बनाया।
संगोष्ठी के तकनीकी सत्रों का सफल संचालन डाॅ. सुमिता श्रीवास्तव ने किया। आभार प्रदर्शन डाॅ. महेश श्रीवास्तव एवं डाॅ. श्रीमती मीना प्रसाद द्वारा किया गया।